शनिवार, 5 अगस्त 2017

दोस्ती का बंधन भी !!!

कुछ रिश्ते
होते हैं प्रगाढ़
जिनकी रगों में
नहीं दौड़ता रक्त
आपसी सम्बन्धों का
बस बन्धन होता है
मन का मन से !
...
कुछ रिश्तों की
बात होती है अनोखी
ज़िक्र होता है इनका
जब भी
तो होता है एहसास
ये रूहानी रिश्ते हैं
दूरियाँ इन्हें क्या बांटेंगी !
दोस्ती का बंधन भी
कुछ ऐसा ही एहसास देता है !!!!
...

रविवार, 23 जुलाई 2017

मन थोड़ा अनमना सा ....

मन थोड़ा अनमना सा घर के कुछ कोने उदास हैं
दूर गया है आज वो मुझसे जो मन के पास है !

कैसे रहना है अपनों से दूर बेगानों के बीच जाने ना
जिसने जाना ना हो अपनेपन की होती क्या प्यास है !

खोया पाया लिया दिया इन बातों का हिसाब न रखा,
उन लम्हो को फिक्स कर दिया जो लगे कुछ खास हैं !

कीमत मत पूछना बहुत कीमती हैं जज़्बात अपनेपन के
अनमोल रिश्तों में खास होता बस यही इक अहसास है !

तस्वीर दीवार पे लगाई तुमने हर पल सामने रहने को
जी भर देखा भी नहीँ जाता सदा होता जब मन उदास है
  

शुक्रवार, 30 जून 2017

तुमने क्या - क्या किया है !!!

कभी ये कहना
कि तुमने ये नहीँ किया से
ज़्यादा ग़ौर यदि
इस बात पर किया होता
कि तुमने क्या - क्या किया है
तो मन उत्साहित हो जाता
और जो रह गया है शेष
उसे पूरा करने में
जुट जाता जी-जान से 😊

शनिवार, 17 जून 2017

बाँहों में आपकी पापा !!!

दुआओ के झूले
कितने हैं झूले
बाँहों में आपकी पापा
थकान को
मुस्कान में बदलने का
हुनर सीखा है आपसे ही
हम मुस्कराते हैं
वज़ह इसकी आप हैं
ज़रूरत हमारी
लगती न आपको
कभी भी भारी
हिम्मत से आपने हर
मुश्क़िल की है नज़र उतारी !!

शनिवार, 20 मई 2017

माँ की नज़रों से ...


माँ की फूंक
चोट पे मरहम
माँ के बोल
मुश्किल समय में दुआ
माँ की गोद
बीमारी में दवा
माँ का हाथ
पीठ पे हौसला
बन जाता है
ये जादू नहीँ तो क्या है
परवाह और फ़िक्र का
माँ की नज़रों से
बच पाना मुश्किल ही नहीँ
नामुमकिन भी है 😊

रविवार, 12 मार्च 2017

हँसे गुलाल !!!

गुलाल उड़ा
मन ही मन रंगा
पगला मन !
..
रंग से मिल
गलबहियाँ डाल
हँसे गुलाल !
..
रंग बरसा
होली के रंग से
रंगी धरा भी !
..
फागुन संग
पवन खेले रंग
उड़े गुलाल !
...
रंग अबीर
सजधज के आये
मनाओ होली !

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

बासंती पर्व !!!!

बसंत पंचमी को
माँ सरस्वती का वन्दन
अभिनंदन करते बच्चे आज भी
विद्या के मंदिरों में
पीली सरसों फूली
कोयल कूके अमवा की डाली
पूछती हाल बसंत का
तभी कुनमुनाता नवकोंपल कहता
कहाँ है बसंत की मनोहारी छटा ?
वो उत्सव वो मेले ???
सब देखो हो गए हैं कितने अकेले
मैं भी विरल सा हो गया हूँ
उसकी बातें सुनकर
डाली भी करुण स्वर में बोली
मुझको भी ये सूनापन
बिलकुल नहीँ भाता !!
....
विचलित हो बसंत कहता
मैं तो हर बरस आता हूँ
तुम सबको लुभाने
पर मेरे ठहरने को अब
कोई ठौर नहीं
उत्सव के एक दिन की तरह
मैं भी पंचमी तिथि को
हर बरस आऊंगा
तुम सबके संग
माता सरस्वती के चरणों में
शीष नवाकर
बासंती पर्व कहलाऊंगा !!!!

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मन को छू लें वो शब्‍द अच्‍छे लगते हैं, उन शब्‍दों के भाव जोड़ देते हैं अंजान होने के बाद भी एक दूसरे को सदा के लिए .....